The Constitution of India
अनुच्छेद 82
प्रत्येक जनगणना के पश्चात् पुनः समायोजन
प्रत्येक जनगणना के पश्चात् पुनः समायोजन— प्रत्येक जनगणना की समाप्ति पर राज्यों को लोक सभा में स्थानों के आबंटन और प्रत्येक राज्य के प्रादेशिक निर्वाचन-क्षेत्रों में विभाजन का ऐसे प्राधिकारी द्वारा और ऐसी रीति से पुनः समायोजन किया जाएगा जो संसद् विधि द्वारा अवधारित करे: परन्तु ऐसे पुनः समायोजन से लोक सभा में प्रतिनिधित्व पर तब तक कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा जब तक उस समय विद्यमान लोक सभा का विघटन नहीं हो जाता है: 5परन्तु यह और कि ऐसा पुनः समायोजन उस तारीख से प्रभावी होगा जो राष्ट्रपति आदेश द्वारा विनिर्दिष्ट करे और ऐसे पुनः समायोजन के प्रभावी होने तक लोक सभा के लिए कोई निर्वाचन उन प्रादेशिक निर्वाचन-क्षेत्रों के आधार पर हो सकेगा जो ऐसे पुनः समायोजन के पहले विद्यमान हैं: परन्तु यह और भी कि जब तक सन् 62026] के पश्चात् की गई पहली जनगणना के सुसंगत आंकड़े प्रकाशित नहीं हो जाते हैं तब तक 7इस अनुच्छेद के अधीन,- (i) राज्यों को लोक सभा में 1971 की जनगणना के आधार पर पुनः समायोजित स्थानों के आबंटन का; और (ii) प्रत्येक राज्य के प्रादेशिक निर्वाचन-क्षेत्रों में विभाजन का, जो 12001] 12001] की जनगणना के आधार पर पुनः समायोजित किए जाएं, पुनः समायोजन आवश्यक नहीं होगा ।]]
सत्यापन प्रतीक्षित
यह क्यों है
संविधान निर्माताओं का उद्देश्य था कि हर जनगणना से उजागर जनसंख्या परिवर्तनों के अनुरूप लोकसभा सीटें समायोजित होती रहें, ताकि समय के साथ प्रतिनिधित्व लगभग समान रहे। पर 1970 और 2000 के दशक तक संसद को चिंता हुई कि तेज़ी से बढ़ती जनसंख्या वाले राज्यों को अधिक सीटें मिलेंगी जबकि जिन राज्यों ने (परिवार नियोजन के माध्यम से) जनसंख्या पर नियंत्रण पाया, उन्हें कम सीटों से दंडित किया जाएगा। जनसंख्या नियंत्रण को हतोत्साहित होने से बचाने के लिए 42वां संशोधन (1976) तथा बाद में 84वां (2001) और 87वां (2003) संशोधन लाए गए, जिन्होंने राज्यों के बीच कुल सीटों के आवंटन को 1971 की जनगणना के स्तर पर स्थिर कर दिया, जबकि राज्य के भीतर निष्पक्षता के लिए आंतरिक निर्वाचन सीमाएँ नई जनगणनाओं (पहले 1991, फिर 2001) के आँकड़ों से पुनर्निर्धारित करने की अनुमति दी। इस स्थगन को 2026 के बाद होने वाली पहली जनगणना तक बढ़ा दिया गया।
न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं
न्यायालय आमतौर पर परिसीमन मामलों से दूर रहते हैं क्योंकि अनुच्छेद 329(क) निर्वाचन क्षेत्रों के परिसीमन से संबंधित कानूनों की न्यायिक समीक्षा पर रोक लगाता है। मेघराज कोठारी बनाम Delimitation Commission (1967) में सर्वोच्च न्यायालय ने ठहराया कि परिसीमन आयोग के आदेश, एक बार अधिसूचित हो जाने पर, न्यायालयों में चुनौती योग्य नहीं हैं, जिससे यह पुष्ट हुआ कि अनुच्छेद 82 के अंतर्गत पुनर्समायोजन को विधायी/प्रशासनिक प्रक्रिया माना जाता है, न कि मुकदमेबाज़ी के लिए खुला क्षेत्र।
आम गलतफहमियाँ
मिथक: लोकसभा में सीटें हर जनगणना के साथ आबादी बढ़ने पर अपने-आप बढ़ जाती हैं।
तथ्य: 1976 से, प्रत्येक राज्य की कुल सीटें 1971 की जनगणना के स्तर पर स्थिर हैं; केवल आंतरिक निर्वाचन सीमाएँ अपडेट होती हैं, सीटों की संख्या नहीं।
मिथक: सीट आवंटन पर लगाया गया स्थगन स्थायी है और अनुच्छेद 82 के मूल पाठ में ही लिखा है।
तथ्य: यह स्थगन बाद में संवैधानिक संशोधनों (42वां, 84वां और 87वां) से जोड़ा गया था और अस्थायी है — यह केवल 2026 के बाद होने वाली पहली जनगणना के प्रकाशन तक चलता है।
मिथक: यदि कोई राज्य अपने साथ अन्याय महसूस करे तो न्यायालय परिसीमन आयोग के निर्णयों को रद्द कर सकते हैं।
तथ्य: अनुच्छेद 329(क) प्रायः न्यायालयों को परिसीमन आदेशों पर प्रश्न उठाने से रोकता है, जैसा कि मेघराज कोठारी बनाम Delimitation Commission (1967) में पुष्ट किया गया।