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सं Samvidhan

The Constitution of India

अनुच्छेद 395

निरसन

निरसन— भारत स्वतंत्रता अधिनियम, 1947 और भारत शासन अधिनियम, 1935 का, पश्चात् कथित अधिनियम की, संशोधक या अनुपूरक सभी अधिनियमितियों के साथ, जिनके अंतर्गत प्रिवी कौंसिल अधिकारिता उत्सादन अधिनियम, 1949 नहीं है, इसके द्वारा निरसन किया जाता है ।

सत्यापन प्रतीक्षित

यह क्यों है

जब 26 जनवरी 1950 को संविधान प्रभाव में आया, तब उपनिवेश-कालीन विधिक ढांचे से स्पष्ट विच्छेद आवश्यक था। Government of India Act, 1935 ब्रिटिश शासन के अधीन भारत का शासकीय क़ानून था, और Indian Independence Act, 1947 ने भारत और पाकिस्तान को अलग डोमिनियन के रूप में बनाया था। अनुच्छेद 395 दोनों को, तथा उनसे संबंधित संशोधन क़ानूनों को, औपचारिक रूप से निरस्त करता है ताकि नया संविधान एकमात्र सर्वोच्च क़ानून बन जाए। 1949 का वह क़ानून, जिसने ब्रिटिश प्रीवी काउंसिल में अपीलों का मार्ग बंद कर दिया था, इसलिए जीवित रखा गया क्योंकि उसने उपनिवेशी न्यायिक कड़ी को पहले ही काट दिया था और अब निरस्त अधिनियमों पर कोई आगे की निर्भरता आवश्यक नहीं थी।

आम गलतफहमियाँ
  • मिथक: अनुच्छेद 395 ने भारत के सभी ब्रिटिश-युगीन क़ानूनों को रद्द कर दिया।

    तथ्य: इसने केवल Indian Independence Act, 1947 और Government of India Act, 1935 (और उत्तरार्द्ध में संशोधन करने वाले क़ानून) को ही निरस्त किया। अन्य अनेक ब्रिटिश-युगीन क़ानून तब तक लागू रहे जब तक उन्हें अलग से रद्द या संशोधित नहीं किया गया।

  • मिथक: इस अनुच्छेद के कारण 1950 के बाद भी प्रीवी काउंसिल भारतीय अपीलें सुन सकती थी।

    तथ्य: अनुच्छेद 395 ने केवल 1949 के उस अधिनियम को संरक्षित रखा जिसने ऐसी अपीलों का अंत पहले ही कर दिया था; इसने प्रीवी काउंसिल के अधिकार-क्षेत्र को पुनर्जीवित नहीं किया।