The Constitution of India
अनुच्छेद 349
भाषा से संबंधित कुछ विधियां अधिनियमित करने के लिए विशेष प्रक्रिया
भाषा से संबंधित कुछ विधियां अधिनियमित करने के लिए विशेष प्रक्रिया— इस संविधान के प्रारंभ से पन्द्रह वर्ष की अवधि के दौरान, अनुच्छेद 348 के खंड (1) में उल्लिखित किसी प्रयोजन के लिए प्रयोग की जाने वाली भाषा के लिए उपबंध करने वाला कोई विधेयक या संशोधन संसद् के किसी सदन में राष्ट्रपति की पूर्व मंजूरी के बिना पुरःस्थापित या प्रस्तावित नहीं किया जाएगा और राष्ट्रपति किसी ऐसे विधेयक को पुरःस्थापित या किसी ऐसे संशोधन को प्रस्तावित किए जाने की मंजूरी अनुच्छेद 344 के खंड (1) के अधीन गठित आयोग की सिफारिशों पर और उस अऩुच्छेद के खंड (4) के अधीन गठित समिति के प्रतिवेदन पर विचार करने के पश्चात् ही देगा, अन्यथा नहीं । अध्याय 4 - विशेष निदेश
सत्यापन प्रतीक्षित
यह क्यों है
संविधान निर्माण के दौरान भाषा, विशेषकर सरकारी व न्यायिक कामकाज में अंग्रेज़ी से हिन्दी और अन्य भारतीय भाषाओं की ओर संक्रमण, अत्यंत संवेदनशील प्रश्न था। निर्माताओं ने चाहा कि यह परिवर्तन हड़बड़ी में राजनीतिक फैसलों से नहीं, बल्कि विशेषज्ञ अध्ययन (अनुच्छेद 344 के आयोग और समिति) के आधार पर सावधानीपूर्वक और क्रमिक रूप से हो। इसी हेतु अनुच्छेद 349 ने 1950 से पंद्रह वर्षों की अस्थायी सुरक्षा जोड़ी—जिसके अंतर्गत संसद न्यायालयों व विधिक पाठों की भाषा पर कानून बनाने से पहले राष्ट्रपति की सोच-समझकर दी गई स्वीकृति आवश्यक थी—ताकि ऐसे संवेदनशील सुधार विचारपूर्ण और सहमति-आधारित रहें।
आम गलतफहमियाँ
मिथक: अनुच्छेद 349 भारत में न्यायालयों की भाषा को स्थायी रूप से नियंत्रित करता है।
तथ्य: अनुच्छेद 349 एक अस्थायी सुरक्षा प्रावधान था जो केवल संविधान के प्रवर्तन के बाद पंद्रह वर्षों (1965 तक) के लिए लागू था; आज यह लागू नहीं है।
मिथक: अनुच्छेद 349 स्वयं यह तय नहीं करता कि न्यायालयों में कौन-सी भाषा प्रयुक्त होगी।
तथ्य: अनुच्छेद 349 ने केवल अनुच्छेद 348(1) के अंतर्गत भाषा से संबंधित विधेयकों के लिए एक विशेष प्रक्रिया (विशेषज्ञ रिपोर्टों के बाद राष्ट्रपति की पूर्व स्वीकृति) निर्धारित की; वास्तविक भाषा-नियम स्वयं अनुच्छेद 348 में निहित हैं।