The Constitution of India
अनुच्छेद 333
राज्यों की विधान सभाओं में आंग्ल-भारतीय समुदाय का प्रतिनिधित्व
राज्यों की विधान सभाओं में आंग्ल-भारतीय समुदाय का प्रतिनिधित्व — अनुच्छेद 170 में किसी बात के होते हुए भी, यदि किसी राज्य के राज्यपाल 2*** की यह राय है कि उस राज्य की विधान सभा में आंग्ल-भारतीय समुदाय का प्रतिनिधित्व आवश्यक है और उसमें उसका प्रतिनिधित्व पर्याप्त नहीं है तो वह उस विधान सभा में 3उस समुदाय का एक सदस्य नामनिर्देशित कर सकेगा] ।
सत्यापन प्रतीक्षित
यह क्यों है
स्वतंत्रता के समय ऐंग्लो-इंडियन समुदाय—ब्रिटिश और भारतीय वंश के मिश्रित लोगों का एक छोटा अल्पसंख्यक—अपना प्रत्याशी स्वयं निर्वाचित कराने लायक मज़बूत वोट-आधार नहीं रखता था। संविधान-निर्माताओं ने चाहा कि ऐसे समुदाय राजनीति में निरव आवाज़ न रह जाएँ, इसलिए उन्होंने आवश्यकता होने पर राज्यपालों को प्रत्येक राज्य की विधान सभा में (और एक संबंधित अनुच्छेद के तहत लोक सभा में भी) एक ऐंग्लो-इंडियन सदस्य नामित करने की अनुमति दी। यह व्यवस्था स्थायी नहीं, बल्कि अस्थायी सुरक्षात्मक उपाय के रूप में थी, जिसे समय-समय पर समुदाय के लिए आरक्षित सीटों के विस्तार से जोड़ा गया था।
आम गलतफहमियाँ
मिथक: अनुच्छेद 333 आज भी राज्यपालों को ऐंग्लो-इंडियन सदस्यों को नामित करने की अनुमति देता है।
तथ्य: संविधान (एक सौ चौथा संशोधन) अधिनियम, 2019 [प्रभावी: 25 जनवरी 2020] ने इस प्रावधान को हटा दिया, जिसके परिणामस्वरूप राज्य विधान सभाओं और संसद में ऐसे नामांकन समाप्त हो गए।
मिथक: राज्यपाल जब चाहें, बिना किसी शर्त के, किसी ऐंग्लो-इंडियन सदस्य को नामित कर सकते थे।
तथ्य: नामांकन के लिए आवश्यक था कि राज्यपाल विशेष रूप से यह राय बनाएँ कि उस समुदाय को प्रतिनिधित्व चाहिए और उसका पर्याप्त प्रतिनिधित्व पहले से नहीं है।