The Constitution of India
अनुच्छेद 316
सदस्यों की नियुक्ति और पदावधि
सदस्यों की नियुक्ति और पदावधि — (1) लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष और अन्य सदस्यों की नियुक्ति, यदि वह संघ आयोग या संयुक्त आयोग है तो, राष्ट्रपति द्वारा और, यदि वह राज्य आयोग है तो, राज्य के राज्यपाल 1*** द्वारा की जाएगी: परंतु प्रत्येक लोक सेवा आयोग के सदस्यों में से यथाशक्य निकटतम आधे ऐसे व्यक्ति होंगे जो अपनी-अपनी नियुक्ति की तारीख पर भारत सरकार या किसी राज्य की सरकार के अधीन कम से कम दस वर्ष तक पद धारण कर चुके हैं और उक्त दस वर्ष की अवधि की संगणना करने में इस संविधान के प्रारंभ से पहले की ऐसी अवधि भी सम्मिलित की जाएगी जिसके दौरान किसी व्यक्ति ने भारत में क्राउन के अधीन या किसी देशी राज्य की सरकार के अधीन पद धारण किया है । 1(1क) यदि आयोग के अध्यक्ष का पद रिक्त हो जाता है या यदि कोई ऐसा अध्यक्ष अनुपस्थिति के कारण या अन्य कारण से अपने पद के कर्तव्यों का पालन करने में असमर्थ है तो, यथास्थिति, जब तक रिक्त पद पर खंड (1) के अधीन नियुक्त कोई व्यक्ति उस पद का कर्तव्य भार ग्रहण नहीं कर लेता है या जब तक अध्यक्ष अपने कर्तव्यों को फिर से नहीं संभाल लेता है तब तक आयोग के अन्य सदस्यों में से ऐसा एक सदस्य, जिसे संघ आयोग या संयुक्त आयोग की दशा में राष्ट्रपति और राज्य आयोग की दशा में उस राज्य का राज्यपाल इस प्रयोजन के लिए नियुक्त करे, उन कर्तव्यों का पालन करेगा ।] (2) लोक सेवा आयोग का सदस्य, अपने पद ग्रहण की तारीख से छह वर्ष की अवधि तक या संघ आयोग की दशा में पैंसठ वर्ष की आयु प्राप्त कर लेने तक और राज्य आयोग या संयुक्त आयोग की दशा में 2बासठ वर्ष] की आयु प्राप्त कर लेने तक इनमें से जो भी पहले हो, अपना पद धारण करेगा: परंतु — (क) लोक सेवा आयोग का कोई सदस्य, संघ आयोग या संयुक्त आयोग की दशा में राष्ट्रपति को और राज्य आयोग की दशा में राज्य के राज्यपाल 3*** को संबोधित अपने हस्ताक्षर सहित लेख द्वारा अपना पद त्याग सकेगा; (ख) लोक सेवा आयोग के किसी सदस्य को, अनुच्छेद 317 के खंड (1) या खंड (3) में उपबंधित रीति से उसके पद से हटाया जा सकेगा । (3) कोई व्यक्ति जो लोक सेवा आयोग के सदस्य के रूप में पद धारण करता है, अपनी पदावधि की समाप्ति पर उस पद पर पुनर्नियुक्ति का पात्र नहीं होगा ।
सत्यापन प्रतीक्षित
यह क्यों है
निर्माताओं का उद्देश्य था कि लोक सेवा आयोग—जो सरकारी सेवाओं में निष्पक्ष भर्ती की देखरेख करते हैं—ऐसे अनुभवी और स्वतंत्र लोगों से भरे हों, न कि ऐसे राजनीतिक मनोनयन से जिनको निष्ठा के पुरस्कृत रूप में आसानी से हटाया या पुनर्नियुक्त किया जा सके। आधे सदस्यों के पास पूर्व सरकारी अनुभव होने की शर्त संस्थागत ज्ञान सुनिश्चित करती है, जबकि निश्चित कार्यकाल, आयु-सीमाएँ, अनुच्छेद 317 के माध्यम से संरचित हटाने की प्रक्रिया, और पुनर्नियुक्ति पर रोक—ये सब सदस्यों को राजनीतिक दबाव से दूर रखने और सरकार की खुशामद कर पद-विस्तार पाने की प्रवृत्ति को रोकने के लिए हैं।
न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं
अदालतों ने सामान्यतः अनुच्छेद 316 को अनुच्छेद 317 के साथ पढ़ा है, यह रेखांकित करते हुए कि कार्यकाल की सुरक्षा और निष्कासन की विशिष्ट प्रक्रिया लोक सेवा आयोगों की स्वतंत्रता को कार्यपालिका के हस्तक्षेप से बचाने के लिए है। आयोग सदस्य के निष्कासन पर न्यायिक निर्णयों ने जोर दिया है कि अनुच्छेद 316 के तहत निश्चित कार्यकाल की गारंटी निरर्थक है, जब तक कि निष्कासन सख्ती से अनुच्छेद 317 की जाँच-प्रक्रिया (आम तौर पर सर्वोच्च न्यायालय की भागीदारी सहित) का पालन न करे; इससे आयोग के कामकाज को मनमाने सरकारी कदमों से अलग रखने की संवैधानिक विभाजन-रेखा मजबूत होती है।
आम गलतफहमियाँ
मिथक: लोक सेवा आयोग का सदस्य सरकार द्वारा कभी भी साधारण रूप से बर्खास्त किया जा सकता है।
तथ्य: हटाना केवल अनुच्छेद 317 में वर्णित विशेष प्रक्रिया के माध्यम से ही संभव है, सरकार की मनमानी से नहीं—ताकि आयोग की स्वतंत्रता सुरक्षित रहे।
मिथक: लोक सेवा आयोग का सेवानिवृत्त सदस्य बाद में उसी आयोग में फिर से नियुक्त किया जा सकता है।
तथ्य: अनुच्छेद 316(3) स्पष्ट रूप से कहता है कि एक बार किसी व्यक्ति का कार्यकाल समाप्त हो जाने पर, उसे उसी पद पर दोबारा नियुक्त नहीं किया जा सकता।
मिथक: लोक सेवा आयोगों के सभी सदस्यों के पास पूर्व सरकारी सेवा होना अनिवार्य है।
तथ्य: केवल लगभग आधे सदस्यों के लिए कम-से-कम दस वर्ष की पूर्व सरकारी सेवा की शर्त है; शेष सदस्यों पर यह विशेष मापदंड अनिवार्य नहीं है।