The Constitution of India
अनुच्छेद 299
संविदाएं
संविदाएं — (1) संघ की या राज्य की कार्यपालिका शक्ति का प्रयोग करते हुए की गई सभी संविदाएं, यथास्थिति, राष्ट्रपति द्वारा या उस राज्य के राज्यपाल 1*** द्वारा की गई कही जाएंगी और वे सभी संविदाएं और संपत्ति संबंधी हस्तांतरण-पत्र, जो उस शक्ति का प्रयोग करते हुए किए जाएं, राष्ट्रपति या राज्यपाल 1*** की ओर से ऐसे व्यक्तियों द्वारा और रीति से निष्पादित किए जाएंगे जिसे वह निर्दिष्ट या प्राधिकृत करे । (2) राष्ट्रपति या किसी राज्य का राज्यपाल 2*** इस संविधान के प्रयोजनों के लिए या भारत सरकार के संबंध में इससे पूर्व प्रवृत्त किसी अधिनियमिति के प्रयोजनों के लिए की गई या निष्पादित की गई किसी संविदा या हस्तांतरण-पत्र के संबंध में वैयक्तिक रूप से दायी नहीं होगा या उनमें से किसी की ओर से ऐसी संविदा या हस्तांतरण-पत्र करने या निष्पादित करने वाला व्यक्ति उसके संबंध में वैयक्तिक रूप से दायी नहीं होगा ।
सत्यापन प्रतीक्षित
यह क्यों है
अनुच्छेद 299, भारत शासन अधिनियम, 1935 से चली आ रही उस प्रथा को आगे बढ़ाता है जिसमें सरकारी अनुबंधों को किसी व्यक्तिगत अधिकारी के नाम पर नहीं बल्कि सम्राट/क्राउन (बाद में राष्ट्रपति/राज्यपाल) के नाम पर करने की आवश्यकता थी। उद्देश्य है कि राज्य के औपचारिक प्रमुख को रोज़मर्रा के सरकारी व्यावसायिक सौदों से अलग रखा जाए, जवाबदेही किसी एक व्यक्ति पर नहीं बल्कि सरकारी तंत्र पर रहे, और अनुबंधों के लिए ऐसी औपचारिक, सत्यापनीय प्रक्रिया हो जिससे राज्य के साथ काम करने वाले नागरिकों और कंपनियों को भरोसा रहे कि समझौता असल में सरकार पर बाध्यकारी है, किसी व्यक्ति पर नहीं।
न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं
सर्वोच्च न्यायालय ने, विशेषकर Chatturbhuj Vithaldas Jasani v. Moreshwar Parashram (1954) और K.P. Chowdhry v. State of Madhya Pradesh (1966) जैसे मामलों में, यह माना है कि उपधारा (1) की औपचारिक शर्तें—कि अनुबंध राष्ट्रपति/राज्यपाल के नाम में व्यक्त हो और किसी अधिकारित व्यक्ति द्वारा निष्पादित हो—सरकारी धन की सुरक्षा के लिए हैं और सामान्यतः अनिवार्य मानी जाती हैं; इसलिए इस रूप का पालन न करने वाला अनुबंध प्रायः सरकार के विरुद्ध प्रवर्तित नहीं किया जा सकता। हालांकि, न्यायालयों ने कुछ लचीलापन भी दिखाया है, जैसे वादा निषेध (promissory estoppel) या प्रतिफल-वापसी/प्रतिशोधन (restitution) के सिद्धांत लागू करके, ताकि कोई निजी पक्ष जिसने सचमुच सरकारी वादे पर भरोसा किया हो या कार्य कर दिया हो, उसे केवल इस कारण पूरी तरह निरुपाय न छोड़ दिया जाए कि औपचारिक अनुबंध शर्तें पूरी तरह नहीं निभीं।
आम गलतफहमियाँ
मिथक: राष्ट्रपति या राज्यपाल व्यक्तिगत रूप से हर सरकारी अनुबंध की बातचीत करते हैं और उन पर हस्ताक्षर करते हैं।
तथ्य: व्यवहार में अनुबंधों पर ‘राष्ट्रपति/राज्यपाल की ओर से’ अधिकारित अधिकारी हस्ताक्षर करते हैं; सर्वोच्च पद पर बैठे व्यक्ति न तो व्यक्तिगत रूप से शामिल होते हैं और न ही व्यक्तिगत रूप से उत्तरदायी होते हैं।
मिथक: यदि कोई सरकारी अनुबंध अनुच्छेद 299 की औपचारिकताओं का पालन नहीं करता, तो निजी पक्ष को कुछ भी नहीं मिलता।
तथ्य: न्यायालयों ने कभी-कभी प्रतिशोधन (restitution) जैसे उपायों की अनुमति दी है या निष्पक्षता के सिद्धांत लागू किए हैं, ताकि जिस व्यक्ति ने सरकार के वादों पर सद्भावना से भरोसा कर काम किया हो, उसे कड़े औपचारिक अनुबंध न होने पर भी निःसहाय न छोड़ दिया जाए।