The Constitution of India
अनुच्छेद 289
राज्यों की संपत्ति और आय को संघ के कराधान से छूट
राज्यों की संपत्ति और आय को संघ के कराधान से छूट — (1) किसी राज्य की संपत्ति और आय को संघ के करों से छूट होगी । (2) खंड (1) की कोई बात संघ को किसी राज्य की सरकार द्वारा या उसकी ओर से किए जाने वाले किसी प्रकार के व्यापार या कारबार के संबंध में अथवा उससे संबंधित किन्हीं क्रियाओं के संबंध में अथवा ऐसे व्यापार या कारबार के प्रयोजनों के लिए प्रयुक्त या अधिभुक्त किसी संपत्ति के संबंध में अथवा उसके संबंध में प्रोद्भूत या उद्भूत किसी आय के बारे में, किसी कर को ऐसी मात्रा तक, यदि कोई हो, जिसका संसद् विधि द्वारा उपबंध करे, अधिरोपित करने या कर का अधिरोपण प्राधिकृत करने से नहीं रोकेगी । (3) खंड (2) की कोई बात किसी ऐसे व्यापार या कारबार अथवा व्यापार या कारबार के किसी ऐसे वर्ग को लागू नहीं होगी जिसके बारे में संसद् विधि द्वारा घोषणा करे कि वह सरकार के मामूली कृत्यों का आनुषंगिक है ।
सत्यापन प्रतीक्षित
यह क्यों है
अनुच्छेद 289 संघीय सिद्धांत को दर्शाता है कि संघ और राज्य अपने-अपने क्षेत्राधिकार में सह-समप्रभु हैं, और किसी को भी दूसरे की मूल सरकारी संपत्ति या आय पर कर लगाने में सक्षम नहीं होना चाहिए। यह संयुक्त राज्य अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया जैसे अन्य संघों में समान प्रतिरक्षणों का प्रतिबिंब है। साथ ही, निर्माणकर्ताओं ने माना कि राज्य कभी-कभी वाणिज्यिक उद्यम (जैसे परिवहन निगम या व्यापारिक संचालन) चलाते हैं जो मूल शासन-कार्य से आगे जाते हैं, और केवल राज्य द्वारा चलाए जाने के कारण ऐसे वाणिज्यिक कार्यों को कर से मुक्त छोड़ना अनुचित लगता था। इसलिए यह अनुच्छेद संघीय शिष्टाचार और व्यवहारिक कर आवश्यकताओं के बीच संतुलन स्थापित करता है।
न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं
उच्चतम न्यायालय ने Andhra Pradesh State Road Transport Corporation v. Income Tax Officer (1964) में इस प्रतिरक्षण के दायरे को स्पष्ट किया, यह ठहराते हुए कि एक वैधानिक निगम, भले ही पूर्णतः किसी राज्य के स्वामित्व व नियंत्रण में हो, स्वयं ‘राज्य’ से भिन्न एक पृथक विधि-व्यक्तित्व है। अतः केवल राज्य के स्वामित्व के आधार पर उसकी आय अनुच्छेद 289(1) के अंतर्गत स्वयंसिद्ध रूप से कर-मुक्त नहीं है। न्यायालयों ने सामान्यतः इस अनुच्छेद का संकीर्ण अर्थ लिया है, और केवल वही संपत्ति व आय संरक्षित मानी है जो सीधे राज्य सरकार की है, न कि उन स्वतंत्र निकायों या निगमों की जिन्हें राज्य ने बनाया है।
आम गलतफहमियाँ
मिथक: किसी राज्य सरकार के स्वामित्व वाली कोई भी कंपनी या निगम अनुच्छेद 289 के तहत स्वतः कर-मुक्त होता है।
तथ्य: न्यायालयों ने माना है कि राज्य-स्वामित्व वाले निगम पृथक विधिक व्यक्तित्व हैं, स्वयं ‘राज्य’ नहीं; अतः उनकी आय केवल स्वामित्व के कारण अनुच्छेद 289(1) के अंतर्गत स्वतः संरक्षित नहीं होती।
मिथक: संघ कभी भी राज्य सरकार से संबंधित किसी भी चीज़ पर कर नहीं लगा सकता।
तथ्य: उपधारा (2) के तहत, यदि संसद इस आशय का कानून बनाए, तो वह किसी राज्य की व्यापार या व्यवसाय संबंधी गतिविधियों तथा उनसे संबंधित संपत्ति/आय पर कर लगा सकती है।