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सं Samvidhan

The Constitution of India

अनुच्छेद 284

लोक सेवकों और न्यायालयों द्वारा प्राप्त वादकर्ताओं की जमा राशियों और अन्य धनराशियों की अभिरक्षा

लोक सेवकों और न्यायालयों द्वारा प्राप्त वादकर्ताओं की जमा राशियों और अन्य धनराशियों की अभिरक्षा — ऐसी सभी धनराशियां, जो — (क) यथास्थिति, भारत सरकार या राज्य की सरकार द्वारा जुटाए गए या प्राप्त राजस्व या लोक धनराशियों से भिन्न हैं, और संघ या किसी राज्य के कार्यकलाप के संबंध में नियोजित किसी अधिकारी को उसकी उस हैसियत में; या (ख) किसी वाद, विषय, लेखे या व्यक्तियों के नाम में जमा भारत के राज्यक्षेत्र के भीतर किसी न्यायालय को, प्राप्त होती है या उसके पास निक्षिप्त की जाती है, यथास्थिति, भारत के लोक लेखे में या राज्य के लोक लेखे में जमा की जाएगी ।

सत्यापन प्रतीक्षित

यह क्यों है

न्यायालयों और सरकारी अधिकारियों के पास प्रायः ऐसा धन आ जाता है जो वास्तविक सार्वजनिक राजस्व नहीं होता—जैसे वादकारियों द्वारा दी गई जमानत/सिक्योरिटी राशि, बिना दावे की पड़ी रकम, या मुकदमेबाजी के दौरान न्यास के रूप में रखी गई धनराशि। संविधान निर्माताओं ने चाहा कि ऐसी रकम सरकार के अपने कर-राजस्व से अलग रहे, ताकि उसे राज्य की संपत्ति समझकर खर्च न किया जाए। अनुच्छेद 284 यह सुनिश्चित करता है कि यह धन निर्धारित ‘सार्वजनिक खाते’ में सुरक्षित रहे, और वास्तविक हक़दारों (वादकारी, जमाकर्ता आदि) के अधिकार तब तक सुरक्षित रहें जब तक क़ानून के अनुसार उसका उचित निपटारा न हो जाए।

आम गलतफहमियाँ
  • मिथक: किसी सरकारी अधिकारी द्वारा प्राप्त कोई भी धन स्वयमेव सरकारी राजस्व बन जाता है।

    तथ्य: अनुच्छेद 284 स्पष्ट करता है कि अधिकारियों या न्यायालयों के पास दूसरों की ओर से रखी गई रकम (जैसे जमा राशि या न्यासी धन) वास्तविक सरकारी राजस्व से भिन्न होती है और इसे सार्वजनिक खाते में अलग से रखना अनिवार्य है।

  • मिथक: ‘सार्वजनिक खाता’ सरकार के सामान्य कोष (संघनित निधि) के समान ही होता है।

    तथ्य: सार्वजनिक खाता सरकार का पृथक कोष है, जिसमें वह धन रखा जाता है जो सरकार का स्वतः स्वामित्व नहीं होता—जैसे जमा राशियाँ, भविष्य निधियाँ, और वादकारियों का धन—उसे संघनित निधि से अलग रखकर, जो सरकार की अपनी आय-व्यय के लिए प्रयुक्त होती है।