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सं Samvidhan

The Constitution of India

अनुच्छेद 243ZP

विवरणियां

विवरणियां — प्रत्येक सहकारी सोसाइटी, प्रत्येक वित्तीय वर्ष की समाप्ति के छह मास के भीतर राज्य सरकार द्वारा अभिहित प्राधिकारी को ऐसी विवरणियां फाइल करेगी, जिनमें निम्नलिखित बातें सम्मिलित होंगी, अर्थात्: — (क) उसके क्रियाकलाप की वार्षिक रिपोर्ट; (ख) उसके लेखाओं का संपरीक्षित विवरण; (ग) अधिशेष के व्ययन की योजना, जो सहकारी सोसाइटी के साधारण निकाय द्वारा यथा अनुमोदित हो; (घ) सहकारी सोसाइटी की उपविधियों के संशोधनों, यदि कोई हों, की सूची; (ङ) उसके साधारण निकाय की बैठक आयोजित करने की तारीख और निर्वाचनों का, जब नियत हों, संचालन करने के संबंध में घोषणा; और (च) राज्य अधिनियम के किन्हीं उपबंधों के अनुसरण में रजिस्ट्रार द्वारा अपेक्षित कोई अन्य जानकारी ।

सत्यापन प्रतीक्षित

यह क्यों है

यह अनुच्छेद भारत भर की सहकारी समितियों में पारदर्शिता और नियमित पर्यवेक्षण लाने के लिए 97वां संविधान संशोधन (2011) द्वारा जोड़ा गया था, क्योंकि वे अक्सर कमजोर शासन, विलंबित चुनाव और वित्तीय कुप्रबंधन से जूझती थीं। गतिविधियों, लेखापरीक्षित खातों, अधिशेष के उपयोग, उपविधि परिवर्तनों और चुनावी स्थिति को समाहित वार्षिक रिटर्न को संवैधानिक रूप से अनिवार्य करके, उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि सहकारी संस्थाएं अपने सदस्यों और राज्य—दोनों के प्रति जवाबदेह रहें, न कि बिना निगरानी के निजी जागीरों की तरह चलें।

न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं

Union of India v. Rajendra N. Shah (2021) में, सर्वोच्च न्यायालय ने भाग IXB (जिसमें अनुच्छेद 243ZP भी शामिल है) की समीक्षा की और माना कि सहकारी संबंधी प्रावधानों को जोड़ने वाला संविधान संशोधन, अनुच्छेद 368(2) के तहत अपेक्षित अनुमोदन (राज्यों द्वारा अनुसमर्थन) के अभाव में अवैध है, क्योंकि यह राज्यों के विषय (सहकारी) को प्रभावित करता था पर कम-से-कम आधे राज्य विधानसभाओं की स्वीकृति नहीं ली गई। हालांकि, न्यायालय ने बहु-राज्य सहकारी समितियों के संबंध में संशोधन का प्रभाव बनाए रखा, क्योंकि उन पर संसद का स्वतंत्र अधिकार-क्षेत्र है। परिणामस्वरूप, अनुच्छेद 243ZP का शुद्ध राज्य-स्तरीय सहकारी समितियों पर अनुप्रयोग प्रभावी रूप से निरस्त हो गया, जबकि यह बहु-राज्य सहकारी समितियों पर लागू रहता है।

आम गलतफहमियाँ
  • मिथक: अनुच्छेद 243ZP आज भारत की सभी सहकारी समितियों पर ज्यों-का-त्यों लागू है—यह कथन सही नहीं है।

    तथ्य: सर्वोच्च न्यायालय ने 2021 में निर्णय दिया कि शुद्ध राज्य-स्तरीय सहकारी समितियों पर यह प्रावधान आवश्यक राज्य-मान्यता (अनुसमर्थन) के अभाव में असंवैधानिक है; अब यह मुख्यतः बहु-राज्य सहकारी समितियों पर ही प्रभावी है।

  • मिथक: यदि सहकारी समिति को लाभ न हुआ हो या कोई बड़ी गतिविधि न हुई हो, तो रिटर्न दाखिल करना वैकल्पिक है—यह कथन गलत है।

    तथ्य: यह अनुच्छेद लाभ से निरपेक्ष होकर हर वर्ष रिटर्न मांगता है, जिसमें न्यूनतम रूप से गतिविधि-प्रतिवेदन और लेखापरीक्षित खाते सम्मिलित होने चाहिए।