The Constitution of India
अनुच्छेद 243ZK
बोर्ड के सदस्यों का निर्वाचन
बोर्ड के सदस्यों का निर्वाचन — (1) किसी राज्य के विधान-मंडल द्वारा बनाई गई किसी विधि में किसी बात के होते हुए भी, बोर्ड का निर्वाचन, बोर्ड की अवधि के अवसान से पूर्व संचालित किया जाएगा, जिससे यह सुनिश्चित किया जा सके कि नवनिर्वाचित बोर्ड के सदस्य, पदावरोही बोर्ड के सदस्यों की पदावधि के अवसान होते ही पद ग्रहण कर लें । (2) किसी सहकारी सोसाइटी के सभी निर्वाचनों के लिए निर्वाचक नामावलियां तैयार करने का और उन सभी निर्वाचनों के संचालन का अधीक्षण, निदेशन और नियंत्रण, ऐसे प्राधिकारी या निकाय में, जो राज्य विधान-मंडल द्वारा, विधि द्वारा, उपबंधित किया जाए, निहित होगा: परंतु किसी राज्य का विधान-मंडल, विधि द्वारा, ऐसे निर्वाचनों के संचालन के लिए प्रक्रिया और मार्गदर्शक सिद्धान्तों का उपबंध कर सकेगा ।
सत्यापन प्रतीक्षित
यह क्यों है
सहकारी समितियों (जैसे ऋण सहकारी, कृषि सहकारी, दुग्ध सहकारी) में अक्सर चुनाव टलते या स्थगित होते रहे, जिससे मौजूदा बोर्ड अनिश्चितकाल तक बना रहता था या निर्वाचित सदस्यों के स्थान पर सरकार-नियुक्त प्रशासक समिति चलाते थे। इससे सदस्यों द्वारा लोकतांत्रिक नियंत्रण कमजोर पड़ता था। 97वाँ संवैधानिक संशोधन (2011) द्वारा भाग IXB जोड़ा गया, जिसमें अनुच्छेद 243ZK भी शामिल है, ताकि समयबद्ध चुनावों की गारंटी दी जा सके और एक स्वतंत्र चुनाव तंत्र बनाया जा सके—ठीक वैसे ही जैसे अनुच्छेद 243K पंचायतों के लिए स्वतंत्र निर्वाचन आयोग का प्रावधान सुनिश्चित करता है।
न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं
उच्चतम न्यायालय के Union of India बनाम Rajendra N. Shah (2021) के निर्णय ने यह कहते हुए 97वें संशोधन के बड़े हिस्से (भाग IXB के अधिकांश भाग सहित) को निरस्त कर दिया कि सहकारी समितियाँ राज्य का विषय हैं, इसलिए अनुच्छेद 368 के अनुसार राज्यों की विधानसभाओं द्वारा अनुमोदन (ratification) आवश्यक था, जो नहीं हुआ। हालाँकि, न्यायालय ने माना कि बहु-राज्य सहकारी समितियों पर पहले से लागू प्रावधान वैध बने रहे। इसका अर्थ है कि अनुच्छेद 243ZK का व्यावहारिक लागू होना इस पर निर्भर करता है कि मामला राज्य-विशिष्ट सहकारी का है या बहु-राज्य सहकारी का।
आम गलतफहमियाँ
मिथक: यह अनुच्छेद आज पूरे भारत की सभी सहकारी समितियों पर समान रूप से लागू होता है।
तथ्य: उच्चतम न्यायालय के 2021 के Rajendra N. Shah निर्णय के बाद, राज्य-विशिष्ट सहकारी समितियों के संदर्भ में इस प्रावधान के कुछ हिस्से संवैधानिक संशोधन में अनुमोदन की कमी के कारण निरस्त कर दिए गए; यह बड़े पैमाने पर केवल बहु-राज्य सहकारी समितियों के लिए प्रभावी बचा है।
मिथक: इस अनुच्छेद के अंतर्गत सहकारी समितियों के चुनावों का नियंत्रण केंद्र सरकार के पास है।
तथ्य: अनुच्छेद यह शक्ति राज्य विधानमंडल को देता है, जो यह तय करता है कि चुनावों की निगरानी कौन-सा प्राधिकरण/संस्था करेगी और प्रक्रिया-संबंधी नियम भी बना सकता है।