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सं Samvidhan

The Constitution of India

अनुच्छेद 228

कुछ मामलों का उच्च न्यायालय को अंतरण

कुछ मामलों का उच्च न्यायालय को अंतरण— यदि उच्च न्यायालय का यह समाधान हो जाता है कि उसके अधीनस्थ किसी न्यायालय में लंबित किसी मामले में इस संविधान के निर्वचन के बारे में विधि का कोई सारवान् प्रश्न अंतर्वलित है जिसका अवधारण मामले के निपटारे के लिए आवश्यक है 2तो वह 3***उस मामले को अपने पास मंगा लेगा और— ] (क) मामले को स्वयं निपटा सकेगा; या (ख) उक्त विधि के प्रश्न का अवधारण कर सकेगा और उस मामले को ऐसे प्रश्न पर निर्णय की प्रतिलिपि सहित उस न्यायालय को, जिससे मामला इस प्रकार मंगा लिया गया है, लौटा सकेगा और उक्त न्यायालय उसके प्राप्त होने पर उस मामले को ऐसे निर्णय के अनुरूप निपटाने के लिए आगे कार्यवाही करेगा । 1. संविधान (बयालीसवां संशोधन) अधिनियम, 1976 की धारा 40 द्वारा (1-2-1977 से ) खंड (5) अंतःस्थापित किया गया और संविधान (चवालीसवां संशोधन) अधिनियम, 1978 की धारा 31 द्वारा (20-6-1979 से) उसका

सत्यापन प्रतीक्षित

यह क्यों है

संविधान-निर्माताओं का अभिप्राय था कि कठिन संवैधानिक प्रश्नों का निर्णय वे वरिष्ठ न्यायालय करें जिनके पास संविधान की समुचित व्याख्या की विशेषज्ञता और प्राधिकार हो, न कि ऐसे गंभीर प्रश्न निचली अधीनस्थ अदालतों पर छोड़ दिए जाएँ। Article 228 निरन्तरता और शुद्धता सुनिश्चित करता है, क्योंकि यह उच्च न्यायालय को हस्तक्षेप कर या तो पूरे विवाद का समाधान करने या फिर संवैधानिक बिंदु स्पष्ट कर देने की शक्ति देता है, जिसके बाद मामला विचारण अदालत को लौट सकता है।

न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं

न्यायालयों ने सामान्यतः माना है कि Article 228 के अंतर्गत मामला वापस लेना स्वतःस्फूर्त या वादकारियों का कोई अधिकार नहीं है; यह इस पर निर्भर है कि उच्च न्यायालय स्वयं संतुष्ट हो कि कोई वास्तविक और महत्त्वपूर्ण संवैधानिक प्रश्न मौजूद है तथा उसका समाधान मामले के निर्णय के लिए आवश्यक है। न्यायालयों ने इस शक्ति के नियमित या सहज प्रयोग से सावधान किया है, और इसे तुच्छ या पहले से सुलझे बिंदुओं के बजाय वास्तविक, निरर्थक-न-होने वाले संवैधानिक प्रश्नों के लिए सुरक्षित रखा है।

आम गलतफहमियाँ
  • मिथक: कोई भी पक्ष केवल यह कहकर कि मामला संविधान से जुड़ा है, उच्च न्यायालय को अपना मामला अपने पास लेने के लिए मजबूर कर सकता है।

    तथ्य: उच्च न्यायालय स्वयं, अपनी संतुष्टि के आधार पर, तय करता है कि संवैधानिक प्रश्न सचमुच महत्त्वपूर्ण और आवश्यक है या नहीं—यह वादकारियों का स्वतःस्फूर्त अधिकार नहीं है।

  • मिथक: Article 228 उच्च न्यायालय को किसी भी विधि से जुड़े सभी अधीनस्थ अदालतों के मामलों को स्थायी रूप से अपने पास रखने की शक्ति देता है।

    तथ्य: इसका दायरा सीमित है—केवल वे मामले जिनमें संविधान की व्याख्या से जुड़ा वास्तविक और महत्त्वपूर्ण प्रश्न हो, न कि साधारण क़ानूनी विवाद।