The Constitution of India
अनुच्छेद 215
उच्च न्यायालयों का अभिलेख न्यायालय होना
उच्च न्यायालयों का अभिलेख न्यायालय होना— प्रत्येक उच्च न्यायालय अभिलेख न्यायालय होगा और उसको अपने अवमान के लिए दंड देने की शक्ति सहित ऐसे न्यायालय की सभी शक्तियां होंगी ।
सत्यापन प्रतीक्षित
यह क्यों है
संविधान-निर्माताओं ने ‘अभिलेख न्यायालय’ की अवधारणा अंग्रेजी सामान्य विधि से ली, जहाँ ऐसे न्यायालयों को विशेष गरिमा प्राप्त थी: उनके अभिलेखों को हुई कार्यवाही का निर्णायक प्रमाण माना जाता था, और उनके पास अपनी प्राधिकृति व कार्यप्रणाली की रक्षा हेतु अवमानना-संबंधी निहित शक्तियाँ होती थीं। इसे सीधे संविधान में रखकर, निर्माताओं ने सुनिश्चित किया कि उच्च न्यायालयों को यह स्थिति और शक्ति साधारण कानून पर नहीं, बल्कि संवैधानिक अधिकार के रूप में मिले — इसलिए कोई साधारण विधि इसे छीन नहीं सकती।
न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं
सर्वोच्च न्यायालय ने माना है कि अनुच्छेद 215 के अंतर्गत अवमानना की शक्ति संवैधानिक और निहित है, जो Contempt of Courts Act, 1971 से स्वतंत्र रूप से अस्तित्व में है — संसद की यह विधि प्रक्रिया को विनियमित कर सकती है, पर इस संवैधानिक शक्ति को न तो समाप्त कर सकती है, न ही घटा सकती है (जैसा कि Sukhdev Singh Sodhi v. Chief Justice तथा T. Sudhakar Prasad v. Govt. of A.P. जैसे मामलों में चर्चा हुई)। न्यायालयों ने यह भी स्पष्ट किया है कि ‘अभिलेख न्यायालय’ होने का अर्थ है कि उच्च न्यायालय के आदेशों पर किसी अधीनस्थ न्यायालय में परोक्ष/सहायक कार्यवाही में प्रश्न नहीं उठाया जा सकता; उनका पुनरावलोकन केवल उच्चतर न्यायालय ही कर सकता है।
आम गलतफहमियाँ
मिथक: यह कहना कि उच्च न्यायालय की अवमानना-शक्ति केवल Contempt of Courts Act, 1971 से आती है, इसलिए संसद उसे वह कानून बदलकर हटा सकती है — गलत है।
तथ्य: न्यायालयों ने माना है कि अनुच्छेद 215 उच्च न्यायालयों को अवमानना दंडित करने की एक निहित संवैधानिक शक्ति देता है, जो 1971 के अधिनियम से स्वतंत्र रूप से अस्तित्व में है; संसद प्रक्रिया को विनियमित कर सकती है, पर इस संवैधानिक शक्ति को समाप्त नहीं कर सकती।
मिथक: ‘अभिलेख न्यायालय’ का अर्थ सिर्फ इतना नहीं है कि न्यायालय कागज़ी कार्य रखता है।
तथ्य: इसका एक विशिष्ट विधिक अर्थ है: न्यायालय की कार्यवाहियाँ और निर्णय सही माने जाते हैं और उनका किसी निचली या परोक्ष कार्यवाही में खंडन नहीं किया जा सकता, और इस स्थिति के साथ न्यायालय को विशेष निहित शक्तियाँ — जिनमें अवमानना-संबंधी शक्तियाँ भी शामिल हैं — प्राप्त होती हैं।